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    वरिष्ठ लेखिका संतोष गोयल का पहला उपन्यास धराशायी सन 1989 में प्रकाशित हुआ था और रेतगार’ 2003 एवं ‘सूर्य रागिनी-दास्तान-ए-मौसम 2014 से गुज़रती हुई उनकी उपन्यास लेखन की यात्रा चैथे उपन्यास ‘2000 का जून’ 2015 तक पहुंची है। छब्बीस वर्षों में कुल चार उपन्यासों का प्रकाशन लेखिका के बहुआयामी व्यक्तित्व की व्यस्तता का परिणाम भी माना जा सकता है और घटनाओं-प्रसंगों को अपने रचना मानस में रचा-पचाकर लेखन में प्रवृत्त होने की सोच का भी।

धराशायी

पहले उपन्यास धराशायी की विषयवस्तु और शैली अगले तीन उपन्यासों से भिन्न है। यह महानगरों में रहने वाले तथाकथित इलीट वर्ग के भीतर की उदासियों और कंुठाओं तथा उसके सतही जीवन दर्शन को सामने लाता है। उपन्यास का मुख्य पात्र जतिन काॅलेज में प्राध्यापक है, रंगमंच का प्रतिष्ठित नाम है और प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी है-कुल मिलाकर एक सुखी, कलामय इलीट व्यक्ति। इसके बावजूद वह बहुत अकेला और उदास है। उसे लगता है कि सभी अभिनय करते रहते हैं-ताउम्र और रोज़-रोज़ झूठमूठ भरकर एक दिन अचानक सचमुच मर जाते हैं-‘पर आदमी/मरेगा तो तब न जब पहले जीये तो।/मौत के इन्तजार में/खटिया पकड़/बैठ रहने ही से तो/मौत नहीं आ जाती।’
जतिन एक प्रकार से स्वयं ही अपने अकेलेपन के लिए जिम्मेदार है। मिनी, अमरू, शिवाली, शुभ्रा जैसी कई युवतियां उसे जीवन-पथ पर मिलीं, आज भी किसी न किसी रूप में उसके जीवन में हैं लेकिन वह किसी को जीवनसाथी नहीं बना पाया। क्लब की नियमित मीटिंगों में वह कितने ही लोगों से मिलता है लेकिन वे उसे उथले प्रतीत होते हैं। उसका अभिन्न मित्र डाॅक्टर अपने प्रोफेशन में अत्यन्त सफल हैं लेकिन उसके विवाहित जीवन में कुछ ऐसा है जो उसे बेचैन बनाए रखता है और वह क्लब में मिलने वाली मिसेज सरकार में रूचि लेने लगता है। स्वयं मिसेज सरकार भी सुखी प्रतीत होती एक छटपटाती आत्मा हैं। कोलाज शैली में रचित यह उपन्यास महानगरीय मध्यवर्ग के भीतरी खोखलेपन को मन की गहराईयों तक झांककर सामने लाता है। 

 ‘रेतगार’

 ‘रेतगार’ की कथा पहले गांव और फिर शहर में विकसित होती है लेकिन सभी स्त्री-विरोधी और उसका शोषण करने की मानसिकता दोनों जगह मौजूद है। रिशम जिस गांव में पैदा हुई और पली-बढ़ी है वह लड़कियों की शिक्षा के सख्त खिलाफ है। गांव का सबसे प्रभावशाली समृद्ध व्यक्ति साईं है जिसका बाहरी व्यवहार सबके साथ मधुर और अपनत्व से भरा है लेकिन जहां से जरा-सा भी चुनौती मिल सकने का आभास होता है, उस व्यक्ति को पल भर भी सहन नहीं करता था-‘साईं के ढेर से चमचे गांव भर में बिखरे थे। जरा सा भी चिंगारी दिखी नहीं कि अंधेरे में दबा-बुझा दी गई। ऐसा लगता कि हवा भी साईं की खरीदी वस्तु है जो सूंघती चलती और ‘इन्फार्मर’ बनी रहती।’ रिशम के पिता से साईं के रिशम का विवाह कर देने की बात कहने के बावजूद रिशम शहर जाकर पढ़ने लगती है। शहर में उसकी सहेली अनीशा का भाई उसे पसन्द करने लगता है। अनीशा का परिवार राजनीति में सक्रिय होने के कारण उसके दो दबंग चचेरे भाई उसे उठा लाते हैं। अनीशा के भाई को उनकी यह हरकत अच्छी नहीं लगती और वह उसे वापस छोड़ आने के लिए कह देता है। वे दोनों भाई उसे वापस छोड़ने से पहले उसके साथ बलात्कार करते हैं-‘अब लाये तो तुझे भाई के लिए थे, पर...उस पर तो इंसानियत का भूत सवार है...फिर इस्तेमाल की चीज़ का इस्तेमाल तो होना ही था...अब खाने की चीज़ सामने पड़ी हो तो छोड़ कैसे देते ?’ साईं को रिशम के उठाये जाने, बलात्कार के बाद वापस छोड़ दिये जाने का समाचार मिलता है तो उसकी ओर से ऐसे मामलों में सुनाया जाने वाला परम्परागत फैसला सुना दिया जाता है कि लड़की को कारी करके मार दिया जाए। इस स्थिति में रिशम के मां-बाबा की वेदना और रिशम के भीतर का हाहाकार अत्यन्त मर्मस्पर्शी रूप में व्यक्त हुआ है। पिता उसे रात के अंधेरे में गांव से बाहर भेज देते हैं।

  शहर आकर उसका पढ़ाई पूरी करना, स्काॅलरशिप लेना, जयन्त के साथ मित्रता होना तथा उसी के फ्लैट में कमरा लेकर रहने लगना जैसी घटनाएं उसकी सीधी समतल राह पर बढ़ते जाने जैसी लगती हैं। जयन्त जिस कंपनी में काम करते थे, वह उसी के बाॅस की सेक्रटरी के तौर पर नौकरी पा लेती है। उसका बाॅस विरज एक दिन उससे विवाह का प्रस्ताव करता है तो वह मान लेती है। विवाह के एक महीने बाद अमेरिका यात्रा का अंत आ जाने तक उनके बीच निकटता स्थापित नहीं हो पाती। विरज उससे स्पष्ट कह देता है-‘तुम नहीं जानतीं, रिशम! तुम्हारा आॅफिस में लगाया जाना, मेरी जिं़दगी में घुस जाने की चुनौती और मेरी राह बदल देने पर, उस स्थान को जिस पर मैं बैठा हूं, हड़प लेने की योजना-यह सब चालबाजी नहीं तो और क्या है ? अब उसकी सारी स्कीम फेल हो गई है और तुम...तुम तो मात्र मछली को पकड़ने के लिए चारा बनकर रह गई हो।’ जयंत ने विराज के लिए उसे चारा बनाया और विराज ने जयंत को मात दे दी। बिजनेस को जंग के तौर पर लेने वाले व्यापारी हर संबंध को बाजार का हिस्सा बना देते हैं। रिशम एक बार फिर टूट जाती है। धीरे-धीरे स्वयं को बटोरकर फिर एक आत्मनिर्भर नारी के रूप में उभरती है-‘मैं हूं वह समय...युग नारी, अकेली अपने पैरों पर खड़ी होने की शक्ति से भरपूर...अपनी कर्ता स्वयं हूं।’  

‘रेतगार’ की नायिका से अगली पीढ़ी की नारी मानी जा सकती है ‘सूर्य रागिनी...’ की नायिका दिष्टि। दिष्टि की मां ने अपने और समाज के जीवन से जाना है कि स्त्री की आत्मनिर्भरता उसके ससम्मा जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक है। वह स्वयं नहीं पढ़ पाई लेकिन बेटी को बीए और बीएड करवा देती है। यह स्त्री-सशक्तिकरण की ओर पहला और सबसे ठोस कदम है। यहीं से उसके वस्तु से मनुष्य बनने की यात्रा प्रारम्भ हो सकती है।  

वस्तु से मनुष्य बनने की संभावना बन जाना और उसका सम्पन्न हो जाना दो अलग-अलग बिंदु हैं जिनका मिलना अनेक कारकों पर निर्भर है। अपने ही प्रियजन प्रायः इसमें सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं। मां द्वारा तय की सीमा रेखा पार कर एमए करने की अपनी इच्छा पूरी करने की जिद दिष्टि को जहां मनुष्य बनने की ओर ले जाती है वहीं अनेक प्रियजनों के रोष का भी कारण बनती है। भले ही बाद में वे सब उस पर गर्व करने लगते हैं।  

पुरुष वर्चस्व का समाज-मानस पिता और पुत्र के रूप में भी स्त्री का दमन करता है लेकिन पति के रूप में जीवनसाथी बनकर आजीवन उसका सिर न उठने देने का जैसे संकल्प लिये रहता है। पति-पुरुष का व्यक्तित्व यदि प्रबल है तो स्त्री को दबकर रहना ही है और यदि उसके व्यक्तित्व में कुछ दुर्बलता है और स्त्री उसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर कुछ निर्णय लेने, कुछ काम करने के रूप में अपने तयशुदा रोल से बाहर निकलकर अधिक सक्षमता का परिचय देने लगती है तो यह भी पुरुष वर्चस्व को अपने पर आघात प्रतीत होता है। ऐसे में अनपढ़ या अधपढ़ पति प्रत्यक्ष दुव्र्यवहार पर उतर आते हैं और आक्रामक हो उठते हैं तो उच्च शिक्षित पति अवसादग्रस्त होकर पत्नी को अपराध-बोध का शिकार बना देते हैं। प्रस्तुत उपन्यास की नायिका को पार्थ के रूप में ऐसा ही पति मिला है जो अपनी हीन भावना के चलते अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है।  

दुख सबको मांजता है और दूसरों के दुख को समझने की अंतर्दृष्टि देता है। दिष्टि को पति के न रहने का दुख व्यापक समाज से जोड़ देता है। वह काॅलेज में समाज सेवा से जुड़कर समाज के कमजोर और घृणित माने जाने वाले वर्ग की यातना को प्रत्यक्ष अनुभव कर पाती है और उनके भीतर की जिजीविषा को पहचानकर उनकी शक्ति से प्रभावित होती है। जी.बी. रोड की वेश्याओं और हिजड़ों के प्रसंग उसके मानस के क्षितिज को विस्तृत करते हैं। जसप्रीत, कावेरी, मालिनी अपने-अपने ढंग से अपने अपने दुखों को झेलती जीती और मरती भी दिखाई देती हैं। उपन्यास की हर स्त्री पात्र पुरुष-वर्चस्व के किसी न किसी रूप के कारण यातना झेल रही है।

स्त्री विमर्श के संदर्भ में लेखिका की सोच सूर्य रागिनी में आए सिया-प्रसंग से स्पष्ट होती है। दिष्टि की आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बेटी सिया का विवाह अमन से हुआ है जिसकी आय से घर चलना मुश्किल है, जो बहुत शराब पीता है और जो विरोध का एक स्वर सहन नहीं कर पाता। धन उसके मानस का केन्द्रीय बिन्दु है। वह खासतौर पर सिया की मां से नफरत करता है क्योंकि वह उसे परम्परागत स्त्री के ढांचे से कहीं बाहर प्रतीत होती है। वह आत्मनिर्भर है और अकेले दो बच्चों को पाल-पोसकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर पाई है और उसे परिवार के किसी पुरुष सदस्य का सहारा लेने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती-ये सब दामाद की दृष्टि में उसकी कमियां हैं जो उसके पुरुष अहं को चोट पहुंचाती हैं। वह कई वर्षों तक सिया को मां के घर नहीं जाने देता।

दो बेटियां पैदा हो जाने पर सिया और बेटियों की उपेक्षा ही नहीं, दुव्र्यवहार भी पैदा करता है लेकिन सिया सहती जाती है ताकि घर बना रहे, बच्चों को पिता का संरक्षण मिलता रहे। एक हद के बाद वह मां के घर जाने का निर्णय लेती है जब मां के यहां सुंदर कांड का पाठ होना है। उसका यह स्वतंत्र निर्णय अमन को इतना क्रोधित कर देता है कि वह अपना अमोघ अस्त्र चला देता है-सिया को छोड़ देने की धमकी देकर। दिष्टि सब जान जाती है लेकिन हस्तक्षेप नहीं करती। सिया बच्चों के साथ मां के पास भी आ जाती है, अमन के साथ अलग घर में भी रहने लगती है-कभी उसे अमन सुधरता दिखता है तो कभी नहीं। अंततः वह पाती है कि उसमें सुधार असंभव है तो अलग रहने का निर्णय ले लेती है।

इस प्रसंग में संतोष गोयल का स्त्री-विमर्श स्त्री को अपनी गृहस्थी बचाने का पूरा प्रयास करने की हिदायत देता दिखाई देता है लेकिन एक सीमा के बाद उससे बाहर आकर अपनी अस्मिता को बचाना आवश्यक है। स्त्री को अपने निर्णय लेने होंगे, परिवार और समाज को उसे उन निर्णयों को लेने का अधिकार देना होगा और उनका सम्मान करना होगा, यह संदेश यह उपन्यास देता है। नायिका अपनी अस्मिता के प्रति चैतन्य है। जीवन में आते दुखों का सामना करना जानती है लेकिन अपने स्वतंत्र निर्णय लेने और बेटी को उसके निर्णय के लिए स्वतंत्र छोड़ने जैसी शक्ति के अपने भीतर मौजूद होने के बावजूद उपन्यास में हर प्रसंग के प्रारंभ में या अंत में नियति अथवा भाग्य की इतनी चर्चा पात्र को दुर्बल बना रही है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि पात्र से स्वयं को निर्लिप्त रख पाने में लेखिका पूरी तरह सफल नहीं हो पाई हैं। 

संतोष गोयल के अन्य तीनों उपन्यासों रेतगार, सूर्य रागिनी दास्तान-ए-मौसम, 2000 का जून के केन्द्र में नारी पात्र हैं। तीनों की नायिकाएं प्रतिभाशाली हैं जिसकी कद्र उनके परिवार भी करते हैं लेकिन परिवार उनके लिए कुछ सीमा-रेखा भी निर्धारित करते हैं जिसे वे स्वीकार नहीं कर पातीं। ‘रेतगार’ की नायिका रिशम और ‘सूर्य रागिनी...’ की नायिका दिष्टि को तो अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए भी परिवार से संघर्ष करना पड़ता है। रिशम के पिता ने स्वयं अध्यापक होने के कारण उसे पढ़ाई के लिए सदा ही पे्ररित किया, दूसरी ओर दिष्टि के माता-पिता भी उसे शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते रहे। रिशम के पिता उसे बेटा मानकर बड़ा करते रहे-उन्होंने बेटी की अस्मिता को मन से सहज रूप से स्वीकार नहीं किया। जब उसके लड़की होने का सत्य उसके बलात्कार के भयावह रूप में सामने आ खड़ा हुआ तो वे टूटकर रह गए। इसके बावजूद रिशम अपने वजूद की किरचें समेटकर और भी कई आघात सहते हुए अन्त में अपने ही दम पर उठ खड़ी होती है-‘मैं वह शहसवार थी, जिसे गिर...गिर...उठ...उठकर दौड़ पड़ना था। वह अर्जुन थी जिसके पास रथ को थाम लेने के लिए कृष्ण की प्रतीक्षा का भी समय न था।’ दिष्टि की मां ने बीए, बीएड तक की शिक्षा में उसे प्रोत्साहित किया लेकिन इससे आगे पढ़ाई की उसकी इच्छा मां को बोझ लगने लगी। पिता, चाचा और नाना की सिफारिशों के बाद एमए शुरू करने पर भी मां का असहयोग जारी ही रहता है। एमए की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दिष्टि के प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद मां के मन से कड़वाहट दूर होती है। ‘2000 का जून’ की नायिका तन्वी को शिक्षा प्राप्त करने के लिए तो संघर्ष नहीं करना पड़ा, एमबीए करने के लिए अमेरिका जाने के लिए परिवार ने बहुत सारी हिदायतें थमाकर आशंकित मन से विदा कर दिया। उच्च शिक्षा के प्रकाश से रोशन खयालों से सम्पन्न युवती और भी खुले समाज में अपने हमख्याल स्वदेशी और विदेशी सहपाठियों, सहकर्मियों के संपर्क में आती है तो मित्रता के किसी संबंध का पे्रम में परिणत हो जाना भी सहज होता है। प्रेम में साथ रहने पर अब अमेरिका जैसे समाज में तो कोई ध्यान भी नहीं देता लेकिन अपने देश की मध्यवर्गीय नैतिकता के लिए यह बहुत बड़ा आघात है। तन्वी अपने प्रेम को खोना नहीं चाहती और उसके लिए परिवार की स्वीकृति भी चाहती है। इसके लिए सात वर्ष बाद अपने घर लौटती है। उसके अपने भीतर का द्वन्द्व और बाद में परिवार में उठा तूफान जिस प्रकार शान्त होता है, वह लेखिका के सामथ्र्य का सूचक है।

‘2000 का जून’


उपन्यास रोचक है, मार्मिक है, समाज को देखने की अधिक पैनी दृष्टि देता है। भाषा की सहज प्रवाहमयता और दिल्ली की ठेठ खड़ी बोली का घरेलू ठाठ मोहित करता है और पात्रों को जीवित एवं जीवन्त बना देता है।
‘2000 का जून’ की नायिका तन्वी का संघर्ष दोहरा है। उसने अपनी पारिवारिक-सामाजिक परम्परा से बहुत हटकर अपने अमेरिकी प्रेमी से विवाह का निर्णय किया है। उसे जहां परिवार को अपने निर्णय से अवगत कराने और उन्हें साथ लेने का कठिन कार्य करना है वहीं स्वयं को भी अपने निर्णय के सही होने के विषय में आश्वस्त करना है। उपन्यास में बहुत समय तक तो वह परिवार के वातावरण को देखते हुए बताने का साहस ही नहीं कर पाती और जब हमउम्र मौसी के मुंह से अचानक यह रहस्य उद्घाटित हो जाता है त बवह एक आत्मविश्वासी और परिपक्व व्यक्ति के तौर पर अपने निर्णय के पक्ष में मजबूती से खड़ी दिखाई देती है। वह अपने परिवार से बहुत प्यार करती है लेकिन वह एक चैतन्य और समर्थ व्यक्ति भी है। उसके नाना का उसके घर में बहुत दखल है क्योंकि मां उनसे बहुत प्रभावित है। वे अपने निर्णय के खिलाफ कुछ सुनना पसंद नहीं करते। काफी सुलझे हुए इनसान हैं लेकिन अपनी मान्यताओं पर अडिग हैं। तन्वी के पिता अभी तक पलायन का रास्ता अपनाते आए हैं। पत्नी को वे टोकते नहीं हैं, अपने माता-पिता की बहू से पटरी न बैठने पर अलग रहने का फैसला उन्होंने स्वीकार कर लिया है। अपनी ठीक-ठाक आर्थिक स्थिति, प्रतिभाशाली बेटी और बेटे के साथ जाहिल पत्नी की परवाह न करते हुए वे चैन से जीते हैं। ऐसे में तन्वी का यह निर्णय उन पर गाज की तरह गिरता है और वे अपनी सुविधाजनक निरपेक्षता के खोल से निकलकर पूरी स्थिति को समझने का प्रयास करते हैं। तथा अपनी संतान के हित में उसके निर्णय का साथ देते हैं। पिता के साथ आ जाने पर मां, नाना और नानी का विरोध भी दब जाता है। 
इस उपन्यास में महानगरों के मध्वर्गीय परिवारों में आते परिवर्तन को भी तन्वी के परिवार के माध्यम से रेखांकित किया गया है। परिवार के अन्य सदस्य तो इसे लक्षित नहीं कर पाते लेकिन सात वर्ष बाद देश लौटी तन्वी की निगाहें ऐसे हर बदलाव को तुरंत पकड़ती हैं। वह नाना की बहुओं की स्थिति, अपनी मां की सोच, अपनी हमउम्र अविवाहित मौसी की पीड़ा को अब अधिक संवेदनशीलता से देखने लगी है। नाना के एकछत्र साम्राज्य में पड़ती दरारें उसे स्वागत योग्य प्रतीत होती हैं। विशेष रूप से भुवि मौसी में आया परिवर्तन समाज में मूक गाय की हैसियत रखने वाली स्त्री के मनुष्य में परिवर्तित होने की कथा कहता है। तन्वी कहीं इसकी उत्प्रेरक भी है, साक्षी भी और सहयोगी भी। एक अन्य समस्या पर भी लेखिका ने इस उपन्यास में ध्यान आकर्षित किया है वह है हिन्दू-मुसलमान के बीच प्रेम संबंध बनने की स्थिति। सामान्यतः भारतीय समाज ने अभी इसे स्वीकार नहीं किया है और राजनीति इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेंकती रहती है लेकिन इसका एक मानवीय पक्ष भी है जिसके चलते कितने ही संवेदनशील हदय यातना झेलते रहते हैं। रिज़ा और शीतांशु का प्रसंग इसी को मूर्त करता है।
संतोष गोयल के इन तीनों उपन्यासों में कुछ तथ्य समान रूप से उभरते दिखाई देते हैं। तीनों उपन्यासों में मां का चरित्र अत्यंत विश्वसनीय और प्रामाणिक बन पड़ा है। वह आदर्श पात्र नहीं है-सामान्य मानवी है जो प्रेम, ममता, करूणा के साथ-साथ क्रोध, ईष्र्या एवं घृणा को भी अपने भीतर समेटे है। अनेक स्थलों पर वह नायिका के विरोध में खड़ी दिखाई देती है लेकिन इसके पीछे आमतौर पर अपनी संतान के प्रति उसकी चिन्ता छिपी होती है। नायिकाओं का अपनी मां के साथ संबंध भी यथार्थ की ठोस धरती पर निर्मित हुआ है। मां के व्यवहार से कुढ़ती, क्रोधित होती और उसे समझ कर उसके प्रति पे्रम से सिक्त नायिका इन उपन्यासों में सर्वत्र दिखाई देती है।
तीनों उपन्यासों में पिता पुत्री के प्रति अधिक संवेदनशील और कोमल दिखाई देता है लेकिन पत्नी के चरित्र से दबा हुआ प्रतीत होता है। वह पढ़ा-लिखा व्यक्ति है, हर घटना और व्यक्ति को भीतर तक समझता है लेकिन ऊपरी तौर पर निरपेक्ष बना रहता है। पत्नी का व्यक्तित्व और परिवार दोनों प्रबल दिखाए गए हैं जिसमें तटस्थ रहकर जीना पति को सुभीते का काम महसूस होता है।
कहा जा सकता है कि संतोष गोयल ने अपने उपन्यासों में भारतीय मध्यवर्ग की सामाजिक-नैतिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का यथार्थ एवं कलात्मक अंकन किया है। समाज की नब्ज़ पर हाथ रखने के अतिरिक्त सकारात्मक दिशा की ओर संकेत भी इन उपन्यासों में विद्यमान हैं।

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